Friday, February 13, 2009

आम चुनाव 2009

लोकसभा चुनाव २००९ , भारतीय राजनीति का अहम् पड़ाव हैं , अतीत के खट्टे - मीठे अनुभवों को अपने दामन मे , संजोये चुनाव२००९ , मात्र दलों की जय - विजय तक नही सिमित हैं , बल्की भारत के राजनीति भविष्य के साथ ही देश की दशा और दिशा तय करने के लिए , भारतीय मतदाताओ के लिए एक चुनौती हैं , क्योकि भारत की राजनीति उस मुकाम पर जा पहुच चुकी हैं ,जहा विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र ,और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की साख दाव पर लगी हुई हैं , इस चुनाव के नतीजे से , जो नए राजनैतिक समीकरण बनाने वाले हैं. वह - "बनो या फ़िर बिगडो " वाले हैं , इसलिए, इस बार मतदाताओ को , राजनेता या राजनैतिक दल के बजाए लोकतंत्र और देश के भविष्य के लिए मतदान करना हैं ।
हर आम चुनाव की तरह ,आम - चुनाव २००९ , के कुछ मुद्दे साफ़ हैं :--
१/ आर्थिक मंदी ,और आर्थिक - सुरक्षा
२/ आतंकवाद और आतंरिक सुरक्षा
३/ भ्रष्टाचार का खात्मा , अपराधो मे कमी
४/सदभावना , एकता , बराबरी
५/ जनसंख्या , रोजगार , विकास
६/ राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय कर्तव्य
७/ धर्म , जातीय , मानवीय और अन्य भावनात्मक मुद्दे

सियासी हालात से लगता हैं कि , आम चुनाव २००९ मे मत बटोरने के लिए ,राजनैतिक - प्रयास , पुराने ढर्रे पर ही चलने वाले हैं , राजनीतिक दल और उम्मीदवार , चुनावी कामयाबी के आजमाए हुए , नुस्खे , मे कोई ख़ास फेर -बदल नही करने वाले हैं । " हमेशा की तरह ख़ुद को सबसे बेहतर बताते हुए , और स्वंय को , मत और सत्ता का हकदार जताते हुए ," वादों और आश्वासनों की बरसात करने की चुनावी रस्म , दलो और उम्मीदवारों की राजनैतिक परिपाटी रही हैं । जिसे पूरे जोश और खरोश के साथ इस बार भी निभाया जाना हैं .
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि--मतदाताओ को उम्मीदवारों मे से किसी एक को चुनने का अधिकार तो हैं , परन्तु उनका उम्मीदवार कौन हो या कैसा हो ? इसे तय करने मे उनकी कोई भूमिका नही हैं .और न ही ऐसा हो , इसके लिए , राजनैतिक दलो ने , मतदाताओ को कोई अधिकार ही दिया हैं . उम्मीदवार कौन हो या तो दल , या फ़िर किसी का चुनाव -लड़ने का व्यक्तिगत निर्णय ही तय करता हैं कि , वह उम्मीदवार हैं और उसे चुनाव मे भाग्य आजमाना हैं . यही कमी , सब कमियों की जड़ हैं . क्योकि पैसो का खेल सबकी आँखों पर पट्टी बाँध देता हैं . और साथ ही आम - आदमी के राजनीति मे भागीदारी को सिमित कर देता हैं -- पद्भ्रष्ट हो चुकी --राजनीति मूल्य विहीनता के चरम पर हैं .ऐसे मे यह स्वीकार करने मे कि - "राजनैतिक दल , जिम्मेदारी के साथ , लोकहित मे काम करेगे , हिचकिचाहट स्वाभाविक हैं .सत्ता-शक्ति के सुख की प्राप्ति के लिए प्रत्यनशील , उम्मीदवारों और दलो का लक्ष्य -- सफलता हैं और कामयाबी के लिए , राजनैतिक गुणवत्ता , नैतिकता , वैचारिक मूल्य का प्रश्न उनके सामने कोई माने नही रखते हैं .अन्यथा राजनैतिक पतन का मुद्दा ही नही उठता ? जब राजनीतिक दल , किसी भी तरह से सफ़लता की प्राप्ति को , अपना मापदंड बनायेगे और उम्मीदवार कामयाबी के लिए , किसी भी तरह की कोशिश से बाज़ नही आयेगे , तो , उसके बाद , जब वह चुनाव जीत कर , जनता का नुमाइंदा बनकर , नुमाइंदगी करने के लिए जायेगा , तो सारी की सारी चुनावी गन्दगी उसके साथ जाएगी और वह ख़ुद , नीतियों ,शुचिता , साधन की पवित्रता , वैचारिक मूल्यों के प्रति , इसलिए ईमानदारी नही बरत पायेगा कि वह , निजी तौर पर , सदाचार को अपनी विजय का कारण नही मानता हैं .और यह राजनैतिक अधकचरापन समस्याओं से कभी भी उबरने नही देगा .और इन सबसे बचने के लिए अपनी और भविष्य की खुशहाली के लिए ,मतदाताओ को भी , उन राजनैतिक जालो को काटना होगा जिसके फंदे मे लोकतंत्र आ फसा हैं । और इससे बचने के लिए एक रास्ता हैं कि भारतीय मतदाताओ का विवेक ,आम चुनाव २००९ ,भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने मे सकारात्मक भूमिका का निर्वाह करने के साथ - साथ , आने वाले दिनों के लिए राजनैतिक - जाग्रति की नयी नजीरे भी लिखने मे कामयाब रहे .


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