Friday, March 13, 2009

विभाजित मानसिकता और बिखरता लोकतंत्र

आम चुनाव २००९ मतदाताओ के लिए अत्यंत कठिन चुनौती होने के बाबजूद भी राजनैतिक - असमंजस के कारण , मतदाता भ्रमित हैं , मजबूत राजनैतिक दलो का जोर चुनाव को - मुद्दे के बजाये व्यक्ति आधारित ऐसा चुनाव बनने मे हैं जिसकी एक सिरा सरकारी गठबंधन और दूसरा सिरा प्रमुख विपक्षी गठजोड़ के हाथ मे हो , चुनावी असमंजसता इससे ज्यादा क्या हो सकती हैं कि , कथित राष्ट्रीय दल ,अकेले अपने बल - बूते चुनाव जीतने मे स्वंय को लाचार महसूस कर रहे हैं इसके चलते , सत्ता पर काबिज होने के लिए ' बेमेलो के मेल ' का चुनावी राजनैतिक संगम , मतदाताओं के राजनैतिक स्नान के लिए घाट बनाने की जुगत मे जोर - शोर से लगा हुआ है
सत्ता की हवस मे डूबे राजनेताओं और राजनैतिक दलों के सामने न तो कोई मान्य वसूल हैं , न , ही कोई सोच हैं कि , सत्ता आने के बाद वे देश को किस दिशा मे ले जायेगे ? जब राजनैतिक उदेश्य और लक्ष्य ही अस्पष्ट हो तो देश को कोई सार्थक दिशा मे ले जाने कि कल्पना व्यर्थ हैं .आम चुनाव मे जीत की दावेदारी के साथ सामने अभी तक आए तीन बड़े गठबधन , राजनैतिक मनोरंजन तो कर सकते हैं परन्तु कोई परिवर्तन हो इसकी संभावना धूमिल हैं .समाजवादी विचारक डा० राम मनोहर लोहिया ' वोट को बदलाव का औजार' मानते थे परन्तु शायद उनकी कल्पना , दिशा -विहीन , मूल्यहीन , अवसरवादी और सत्ता परक राजनीति को लेकर नही थी , एक दूसरे के ख़िलाफ़ ढोल पीटकर अपने उम्मीदवार खड़ा कराने के बाद भी राजनैतिक भाई - चारा और एकता की दुहाई के साथ देश को प्रगति के शिखर की और ले जाने के दावे - प्रतिदावे को देखकर शायद गैर काग्रेसवाद के जनक परिवर्तन के सिद्वांत पर गौर करने पर मजबूर हो जाते कि दिशाविहीन बदलाव देश को कहा ले जायेगा और ऐसे बेसुरे राजनैतिक ताल -वेताल से लोकतंत्र कितना बेहाल हो जायेगा ? पर आज के राजनेताओ के पास इस बिन्दु पर चितन करने का समय ही कहा हैं ? देश या प्रजा इसकी किसको पड़ी हैं ? चिंता तो केवल यह हैं कि वे ख़ुद कहा होगे ? भारतीय संसदीय चुनाव मे इतनी गिरावट कभी देखने मे नही आयी थी ? इससे इतना जरुर साफ़ हैं कि , लोकतंत्र परिपक्व होने के बजाये कमजोर हुआ हैं जो देश और जनता के हित साधन के बजाये कुछ लोगो के व्यक्तिगत स्वार्थो की पूर्ति के लिए सीढ़ी बनकर रह गया हैं .

१९५२ से जारी चुनावी सफर का , आम चुनाव २००९ सबसे कमजोर पड़ाव हैं , शायद यह पहला ऐसा चुनाव हैं जिसकी कोई वैचारिक दिशा नही हैं , राजनैतिक मुद्दों का इतना अभाव हैं कि विचारो और मुद्दों की जगह राजनैतिक लतीफेबाजी और शागूफेबाज़ी ने ले ली हैं हर दल की दिल्ली ख्वाहिश हैं कि मतदाता अपनी और दूसरो की तमाम समस्याओं को भूलकर उनकी नकली अदाओं पर लट्टू हो जाये . अपनी नैतिक कमजोरी छुपाने की दलो की भोडी कोशिशों से पैदा हुई - राजनैतिक असमंजसता का सबसे ज्यादा नुकसान मतदाताओ को ही होना हैं इसलिए मतदाताओ को इससे सावधान रहना चाहिए , यह भी सही हैं कि दलो मे सुधार हो ,इसके लिए मतदाताओ के पास कोई ठोस विकल्प नही हैं , परन्तु सिमित विकल्पों के बुद्धिमानी पूर्ण प्रयोग से बहुत कुछ बच जाने का विकल्प मतदाताओ के पास जरुर हैं और उन्हें बेहिचक अपनी इस शक्ति का उपयोग आम चुनाव २००९ मे करना चाहिए . ताकि विभाजित राजनैतिक मानसिकता और बिखरते लोकतंत्र को सही दिशा मे ले जाने के लिए अवसर मतदाताओं के हाथ मे बने रह सके .

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