चुनाव २००९ कई मानो मे पिछले आम चुनावों से अलग हैं इस चुनाव मे सबसे बड़ा मुद्दा , सकारात्मक राजनैतिक मुद्दों का नाममात्र होना हैं. वैसे तो चुनाव मे नकारात्मक मुद्दों की कोई कमी नही हैं राजनीति के अपराधीकरण का जो स्वरूप इस चुनाव मे उभरा हैं ऐसा पहले कभी देखने को नजर नही आया था , इससे भी अजीब बात हैं कि , जिस तरह से राजनैतिक दल लोकलाज छोड़ कर राजनैतिक अनैतिकता और अपराध को महिमा मंडित कर रहे हैं , उससे साफ हैं कि राजनैतिक मूल्यों के पतन को लेकर राजनेताओं के दिल मे कोई अपराध -बोध नाम की चीज नही बची हैं . इस चुनाव का सबसे काला पक्ष - देश के स्थापित राजनेताओं का झूठ बोलना और पकडे जाने के बाद भी बड़ी बेशर्मी के साथ झूठ का संगरक्षण करना हैं , चुनाव २००९ के तीन चरण पूरे होने तक ऐसी अनेको तस्वीरे जनता के सामने आ चुकी हैं मिसाल के तौर पर किसी गहरी बात मे जाने के बजाए , केवल उन चीजो की ओर नजर डाली जाए जो शीशे की तरह साफ़ हैं तो इसका अनुमान लगाने मे देर नही लगेगी कि ,जो छुपा हुआ हैं ,वह क्या और कैसा हैं ?
चुनाव २००९ मे पहली बार यह देखने को मिला कि अधिकाँश राजनैतिक दल एक दूसरे के ख़िलाफ़ चुनावी मैदान मे जोर अजमाइश करते हुए या यह कह लीजिए कि एक दूसरे की बड़ी बेदर्दी के साथ धज्जिया बिखरते हुए भी एक -दूसरे के साथ बहुत मजबूत चुनावी गठबंधन का लगातार दावा कराने से बाज़ नही आ रहे हैं और यह बात केवल देश के दो बड़े राजनैतिक गठबंधन यूपीए और एनडी ए तक सिमित नही हैं बल्की तीसरे और चौथे मोरचे तक मे है मजेदार बात यह भी हैं कि ऐसे भी दल हैं जो एक साथ अलग -अलग दो-दो गठबंधन मे एक हैं जैसे श्री राम विलास पासवान की सदारत वाली पार्टी लोकजन शक्ति पार्टी ,श्री लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल जो श्री मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल करके यूं पी ए के सबसे बड़े घटक काग्रेस के ख़िलाफ़ उत्तरप्रदेश,बिहार ,झारखंड मे पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ रहे हैं परन्तु यूं पी ए के साथ उनके रिश्ते बरकरार हैं ऐसा ही अजूबा एन डी ए मे भी हैं उसके घटक दल भारतीय जनता पार्टी , जनता दल { यूं } शिवसेना कई जगहों मे खुलेतौर पर एक दूसरे के ख़िलाफ़ मैदानी जंग मे हैं परन्तु उनका गठबंधन यथावत हैं इसके साथ - साथ प्रधानमंत्री पद के लिए बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो सुश्री मायावती को सबसे योग्य मानने और बताने वाले वामपंथी भी इसके अपवाद नही हैं जगह -जगह उनके तीसरे मोर्चे और उनके मनपसंदीदा प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के दल एक दूसरे के सामने हैं , केन्द्र मे काग्रेस की सरकार का समर्थन कर रही समाजवादी पार्टी भी चुनाव मे भले ही काग्रेस के ख़िलाफ़ हो किंतु यदि सत्ता के लिए जरुरत हुई तो एक दूसरे से हाथ मिलाने से इनकार नही करती हैं ऐसी अनैतिक गोलबंदी राजनीति मे अतीत मे कभी देखने को नही मिली , सत्ता की पिपासा या परिवर्तन की भूख ने १९८९ ,और उसके बाद बदलती सरकारों मे भी दिखा था ,स्व.वी.पी.सिंह ,स्व.चंदशेखर जी ,श्री इन्द्र कुमार गुजराल , श्री देवगौडा ने सरकार के लिए अनेक पक्षों से हाथ मिलाये थे फ़िर भी इतना झूक कर नही .
सच तो यह है कि , चुनाव २००९ मे गोलबंदी मतदाताओ के बीच नही बल्की राजनैतिक दलो के बीच हैं राजनैतिक दलो या राजनेताओं के बीच की सहमति का आधार कोई राजनैतिक मूल्य या विचारधारा नही अपितु सिर्फ़ सत्ता हैं और इससे भी ज्यादा दूखद हैं कि राजनेताओं द्वारा सरे आम विचारों और मूल्यों की नीलामी पर उनके दलो के राजनैतिक कार्यकर्ताओं तक को कोई आपत्ति नही हैं । मतदाताओ के विश्वास की ऐसी खरीद - फरोख्त के शायद चुनावी इतिहास मे पहले कभी नही हुई थी .
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